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सुन्नी और वहाबी की पहचान (2)

Bismillah

 

नमाज़ियों की वजह से अज़ाब दूर हो जाता हे 

1  हदीसे क़ुदसी : हज़रत अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत हे की हमारे गम ख़वार नबी सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया की बे शक अल्लाह तआला ने फ़रमाया की में जमीन वालो पर अज़ाब नाजिल करना चाहता हु मगर  जब मस्जिदो को आबाद करने वाले नमाज़ियों को देखता हूँ  और मेरे  लिया आपस में मोहब्बत रखने वालो और पिछली रात में तोबा इस्तग़फ़ार करने वालो को देखता हु तो अपना अज़ाब तमाम दुनिया वालो से उठा लेता हूँ

(बैहक़ी शरीफ बहवाला अल अमनो वल उला स. 21 ) 

    नेक मुसलमानो की वजह से बला दूर हो जाती हे

2  हदीस शरीफ: हज़रात अब्दुल्लाह बिन उमर रजिअल्लाह हु अन्हु से रिवायत हे फरमाते हे की हमारे नबी सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम  ने इरशाद फ़रमाया बे शक अल्लाह तआला नेक मुसलमान की वजह से उस के पड़ोस में सो घर वालो से बला दूर फरमा देता हे 

(तबरानी शरीफ बहवाला अल अमनो वाल उला स. 21 )

3 हदीस शरीफ : हज़रत अनस रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत हे की रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम के ज़माने में दो भाई थे एक कसब करके रोज़ी कमाते और दूसरा भाई हुज़ूर नबी सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम की खिदमत में हाज़िर रहते तो कमाने वाले भाई ने उस दूसरे भाई की शिकायत की जो खिदमत में लगे रहते थे तो आप नबी पाक सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम शिकायत करने वाले से फ़रमाया की तुम को भी उस की खिदमत की बरकत से रोज़ी मिलेगी !

( तिर्मिज़ी शरीफ हाकिम बहवाला अल अमनो वल उला स. 22 )

हज़रात  अल्लाह तआला की किताब क़ुरआन मजीद और रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम के अक़वाल और सहाबा ए किराम के बयानात और आइमा व मोहद्दिसिन की रिवायत से साफ़ साफ़ जाहिर और साबित हो गया की जब नमाज़ियों और नेको की बरकत से नफा   पहुचता हे और बला और मुसीबत दूर हो जाती हे तो महबूब ए ख़ुदा जनाब मोहम्मदुर रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम के जुदो नवाल करम व बख्शीश  और अता व सख़ावत नफा पहुचने की कुव्वत और बला व मुसीबत को दूर करने की ताकात का क्या अलाम होगा 

( मोमिन मुसलमान को चंद  हदीसे काफी हे मगर मुनाफ़िक़ बदअकीदा पर पुरे क़ुरआन का कुछ असर नहीं!)

 वहाबी देओबंदी का अक़ीदा की नबी और उम्मत सब बराबर  हे   

हज़रात! मोमिन तड़प उठेगा मगर मुनाफ़िक़ पर कुछ असर नहीं होगा 

1 सब इंसान (नबी हो या उम्मती) आपस में भाई भाई हे जो बड़ा हो वह बड़ा भाई ओलिया व अम्बिया इमाम जादा  पीर व शहीद सब  इंसान ही हे  और आजिज़(मजबूर )  बन्दे हे और हमारे भाई हे और उनकी ताज़ीम इंसानो की तरह करनी चाहिए 

(तक़वीयतूल ईमान स. 131 )

2  रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम  को न किसी को कुछ देने  की ताकात हे न किसी से कुछ लेने  की ताकात हे  इस वजह से सब बन्दे चाहे नबी हो या छोटे  बन्दे  आम मकलूक सब बराबर हे और मजबूर है 

(तक़वीयतुल ईमान स. 59 )

3 हर मख्लूक़ बको अपना बुज़ुर्ग मानते है ड़ा हो या छोटा अम्बिया ओलिया अल्लाह की शान के आगे चमार से भी जयादा जलील हे (तक़वीयतुल ईमान 41 )

4 अम्बिया और ओलिया अल्लाह के रूबरू एक जर्रा ए नाचीज से भी कम तर हे (तक़वीयतुल ईमान स. 119 )

5 नबी की तारीफ एक आम आदमी की तरह बल्कि उस से भी काम करो (तक़वीयतुल ईमान स. 136 )

6  मख्लूक़ होने में ओलिया व अम्बिया में और जिन व शैतान में और भूत व परी  में कुछ फर्क नहीं   (तक़वीयतुल ईमान स. 30 ) 

7 दुनिया के सारे काम अल्लाह ही के चाहने से होता हे रसूल के चाहने  से कुछ नहीं होता     ( तक़वीयतुल ईमान स. 126 )

8  नबी ऐसे हे जैसे गाँव के चौधरी !  ( तक़वीयतुल ईमान स. 64 )

9 उम्मती अमल में नबी के बराबर हो सकता हे बल्कि नबी से बढ़ सकता हे ( तहज़ीरुन्नास स. 5 )

  ईमान वालो का अक़ीदा हे हमारे नबी जुमला अम्बिया व रसूल से अफज़ल हे 

हज़रात ! अल्लाह तआला ने अपने प्यारे रसूल मुस्तफा जान ए रहमत सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम को किस कदर शरफों बुज़ुर्गी से सरफ़राज़ फ़रमाया 

1  आयात ए करीमा : मुहम्मद तुम्हारे मर्दो में किसी के बाप नहीं हाँ अल्लाह के रसूल हे और सुब नबियो में पिछले (कन्जुल ईमान पारा 22 रुकुह 2 )

अल्लाह तआला ने कितने वाजहे अंदाज़ में इरशाद फ़रमाया की हमारे प्यारे रसूल सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम को बाप की हैसियत से दर्जा व मक़ाम मत देना बल्कि मेरे महबूब रसूल हे  और आखरी नबी हे 

यानि अल्लाह तआला की मशीयत यह हे की मेरे  हबीब सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम को बड़ा भाई छोटा भाई या एक आदमी दर्ज़ा तो क्या बाप के दर्ज़ा  हैसियत  से भी न देखना बल्कि मेरा महबूब सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम अल्लाह के रसूल और आखरी नबी हे 

हज़रात ! अल्लाह तआला ख़ालिक़ और मालिक हे मगर अपने प्यारे रसूल सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम को रसूल और आखरी नबी फरमा रहा हे 

मगर अफ़सोस की वहाबी देओबंदी तब्लीगी लोग जर्रा ए नाचीज़ से भी काम तर और चमार से जयादा ज़लील कह  रहे हे माज़ल्लाह 

हज़रात इन्साफ की आँख से देखिए और फैसला कीजिए की एसा गन्दा अक़ीदा रखने वाले  मोमिन व मुसलमान हो सकते हे हर गिज  नहीं  

2 यह रसूल हे हमने उन में से एक को दूसरे पर अफज़ल किया उन में किसी से अल्लाह ने कलाम फ़रमाया और कोई वह हे जिसे सब पर दर्जो बुलन्द किया 

(कन्जुल ईमान पारा 3 रुकुह 1 )

हज़रात : अल्लाह तआला अलीम व ख़बीर हे  वह जानता था की कुछ लोग कलमा व नमाज़ पढ़ने वाले और रोज़ा व दाढ़ी रखने वाले रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम को आम मख्लूक ही नहीं बल्कि जर्रा ए  नाचीज से भी कमतर और चमार से भी ज्यादा ज़लील कहेंगे और लिखेंगे की हम ने ऐसा जो कहा या लिखा हे अल्लाह की मख्लूक़  होने के एतिबार से कहा हे की सब अल्लाह ही की मख्लूक़ हे तो  रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम के ख़ालिक़ व मालिक अल्लाह तआला ने क़ुरआन ए मजीद व   कलमा व नमाज़ पड़ने  वाले मुनाफ़िक़ों और रोज़ा व दाढ़ी रखने वाले बे ईमान को गया जवाब दिया  हे की एक रसूल दूसरे रसूल के बराबर नहीं आम मख्लूक़  और आम आदमी  तो कुजा ? बल्कि बाज़ रसूल से अफज़ल व आला है और सारे अम्बिया और तमाम रसूलो से अफज़ल व आला जनाब ए मोहम्मदुर रसूलल्लाह रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम है !

 

आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फ़ज़िले बरेलवी रज़िअल्लहुअन्हु फरमाते हे 

ख़ल्क़ से औलिया औलिया से रुसूल 

और रसूलो से आला हमारा नबी 

सब से आला व औला हमारा नबी 

सब से बाला व आला हमारा नबी 

नेअमत व दौलत देने वाला हमारा नबी 

हज़रात : अल्लाह तआला ने अपने महबूब रसूल रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम को दोनों जहान की नेअमत व दौलत देने की ताक़त अता फ़रमाई  

1  और जो कुछ तुम्हे रसूल अता फरमाए वह लो और जिससे मना फरमाए बाज़ रहो (कन्जुल ईमान पारा 28 रुकुह 4 )

2  और क्या अच्छा होता अगर वह उस पर राज़ी होते जो अल्लाह व रसूल ने उनको दिया और कहते हमें अल्लाह काफी हे अब देता हे हमें अल्लाह अपने फज़ल से ओर अल्लाह का रसूल (कन्जुल ईमान पारा 10 रुकुह 13 )

हज़रात : इन आयतो से अल्लाह तआला के फरमान से साफ़ तोर पर जाहिर फरमा और साबित हो गया की अल्लाह तआला ने रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम को देने की ताक़त व कुव्वत अता फ़रमाई हे इसी लिया तो रब तआला फ़रमाता हे की  मेरा रसूल तुम्हे दे वह ले लो  

और आयते मुबारका से यह भी पता चला की अल्लाह तआला  देता हे और अल्लाह तआला की अता से व बख्शिस से उसके रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम भी देते है इसीलिए तो अल्लाह तआला फ़रमाता है 

जो अल्लाह और उसके रसूल ने उनको दिया (कन्जुल ईमान पारा 10 रुकुह  13 )

वहाबी देओबंदी का अक़ीदा जो तक़वीयतुल ईमान स. 59 पर लिखा हे की  रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम न किसी को कुछ देने की ताक़त हे न किसी से कुछ लेन की ताक़त हे (माज़ल्लाह )

ईमान के सात फैसला कीजिए की अल्लाह तआला फ़रमाता हे की जो अल्लाह व रसूल ने उनको दिया !

तो मालूम  हुआ क़ुरान ए करीम का दिया हुआ सच्चा अक़ीदा यह हे की  रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम देते हे अता फरमाते हे और वहाबी देओबंदी का झूठा अक़ीदा की रसूलल्लाह को कुछ देने की ताक़त नहीं यह खुला हुआ क़ुरान का इनकार जो यक़ीनन कुफ्र है ! 

हज़रात :वहाबी देओबंदी का अक़ीदा हे  की अगर कोई यह कहे की अल्लाह व रसूल ने दिया तो वो मुशरिक हो जाता हे जब की आयात ए करीमा  अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है

जो अल्लाह व रसूल ने उन को दिया (कन्जुल ईमान पारा 10 रुकुह 13 )

हदीसे बुखारी की नबी बाटते है

 हज़रात : हम अहले सुन्नत व जमाअत का अक़ीदा हे और ईमान हे की अल्लाह तआला की अता से हमारे नबी देते है और मांगने वाले का सवाल पूरा फरमाते हे

हदीस शरीफ : इमाम बुखारी रहमतुल्लाह तआला अलैहि ने लिखा की हमारे नबी हुज़ूर क़सीमे  नेअमत व दौलत  रसूलल्लाह  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया 

अल्लाह तआला देने वाला और में बांटने वाला हु (सहीह बुखारी शरीफ जिल्द 1 स. 16 )

वहाबी देओबंदी का अक़ीदा की नबी के चाहने से कुछ नहीं होता

वहाबी देवबंदी का अक़ीदा तक़वीयतुल ईमान स, 126 पर लिखा हे की रसूल के चाहने से कुछ नहीं होता

ईमान वालो का अक़ीदा की नबी के चाहने से क़िबला बदल गया

और सहाबा किराम से ले कर आज तक तमाम मोमिन मुसलमनो का अक़ीदा हे की नबी अल्लाह तआला की मर्ज़ी से ही हमारे प्यारे रसूल  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम के चाहने से अल्लाह तआला उसको पूरा फरमा देता हे !

तो जरूर हम तुम्हे फैर देगे उस क़िब्ला की तरफ जिसमे तुम्हारी खुशी है (कन्जुल ईमान पारा 2  रुकुह 1 )

आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फ़ज़िले बरेलवी रज़िअल्लहुनहु फरमाते हे

खुदा की रज़ा चाहते हे तो आलम

खुद चाहता हे रज़ा ए मुहम्मद ( सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम)

ए   ईमान  वालो इन्साफ से काम लीजिए और फैसला कीजिए की वहाबियों देवबंदियों ने किस क़द्र अल्लाह तआला के हबीब मुस्तफा जाने रहमत सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम की शाने अक़दस में खुलकर बेअदबी और गुस्ताखी की इस तरह गुस्ताखी व बेअदबी तो इब्लीस शैतान ने भी नहीं सोचा होगा जो ये मुनाफ़िक़ कलमा नमाज़ व दाढ़ी की आड़ में कर रहे हे और अपनी किताब में लिख कर छाप रहे हे उन्ही गुस्ताखी और बेअदबी की वजह से वहाबी देवबंदी काफिर और मुर्तद है 

लिहाज़ा हर हाल में इनसे दूर रहना हे और उनको अपने से दूर रखना फ़र्ज़ हे यह मर जाय तो  उनकी नमाज़ ए  जनाज़ा में शरीक होना उनके पीछे नमाज़  पड़ना उनके यहाँ शादी करना और उनके सात खाना पीना और उठना  बैठना  सख्त मना  हे सख्त मना  हे सख्त मना  हे और हराम हे इन उमूर को जाइज़ किया तो कुफ्र है

आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते हे

सुना जंगल रात अंधेरी छाई बदली काली हे 
सोने वालो  जागते रहियो चोरो की रखवाली हे  
वहाबी देवबंदी का अक़ीदा की मजलिसे मिलाद शरीफ हर हाल में हराम

बहुत ही गुर फ़िक्र के सात कलेजा थाम कर सुनिए ! और अपने ईमान और इस्लाम की फ़िक्र कीजिए और वहाबी देवबंदी तब्लीगी किस कद्र बे अदब और गुस्ताख़ हे

मोलवी रशीद अहमद गंगोही लिखता हे ! मजलिसे मिलाद हर हाल में हराम हे  (फतवा रशीदिया जिल्द 2 स. 83 )

वहाबी देवबंदी का अक़ीदा मिलाद कन्हैया के जनम की तरह हे

मश्हूर देवबंदी मोलवी खलील अहमद अम्बेठवी लिखता हे !

1  रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम की मिलाद कन्हैया की जनम की तरह हे (बहारिने  कतिया स. 148 मतबूआ देवबंदी )

 2 अहले हदीस कहलाने वाले मोहद्दिस मिया नज़ीर हुसैन देहलवी के शार्गिद अबु यहया मुहम्मद शाहजहाँ पूरी लिखता हे मिलाद शरीफ  कयाम वगेरह बिदअत और शिर्क है ! ( अल इरशाद इला सबिलीइरशाद   स. 48)

3 मिलादे मोहम्मदी के वाक़ियात जो बयां किये जाते हे सरासर झूठे है और किसी दज्जाल के गढ़े हुआ है !( अखबारे मोहम्मदी देहली स. 3 15 जनवरी 1940 )

4  12  रबीउल अव्वल के दिन दुकाने बंद रखना मौलूद करना गुनाह है !  ( अहले हदीस अमृतसर स. 6  20  मई 1938 )

6  जिस मस्जिद में महफिले मिलाद व क़याम हों तो ऐसी मस्जिद में नमाज़ न पड़ना वाजिब हे ( फतवा सत्तरीया जिल्द 1  स. 57 ) 

हज़रात वहाबियों के पीर मोलवी रशीद अहमद गंगोई का फतवा आप हज़रात पढ़ लिया हे की महबूबे ख़ुदा सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम की मिलाद  हराम है मगर यही वहाबी के पीर मोलवी रशीद अहमद गंगोई का फतवा हे की बच्चो का जन्म दिन सालगिरह मनाना दुरुस्त है  

7  बच्चो की सालगिरह मनाना और उसकी खुशी में खाना खिलाना जाइज़ दुरुस्त है ! ( फतवा रशीदिया जिल्द 1 स. 74 )

हज़रात  वहाबियों देवबंदियों के ईमान के सात अक़्ल भी बर्बाद हो चुकी है बच्चो का जन्म दिन मनाना दुरुस्त और महबूबे ख़ुदा सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम की मिलाद नाजायज़ व हराम

ख़ुदा दीन  लेता हे तो अक़्ल भी छीन लेता हे 

अहले हदीस कहलाने वाले मिया नज़ीर हुसैन लिखते है

ल इलाहा इल्लल्लाहु मोहम्मदुर्रसूलल्लाह  का वजीफा जाइज़ नहीं ( फतवा नज़ीरिया जिल्द 1 स, 449 मतबूआ देहली )

 जिस मुसलमां के घर ईदे मिलाद हों 
उस मुसलमां की किस्मत पे लाखो सलाम 

ईमान वालो का अक़ीदा की जिक्रे मिलाद शरीफ कारे खैर और महबूब अमल है

ए ईमान वालो ! मुनाफ़िक़ों और गुस्ताख  ने मिलादे पाक के बारे में इस कद्र देरीदा दहनी और बेअदबी का मुज़ाहरा किया है की इस कद्र बेबाक और निडर तो यहूद और नसारा भी नहीं थे लिहाज़ा इन बेअदबो को पहचाने और इनसे दूर रहे और अपने ईमान की हिफाज़त करे और यकीं रखिये की हमारे प्यारेआका  रसूलल्लाहसल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम के मिलाद शरीफ का ज़िक्र करना नाजायज़ व हराम नहीं  बल्कि क़ुरआन व सुन्नत और सहाबा ए किराम बुज़ुर्गाने दीन के अक़वाल व अहकाम से जाहिर और साबित हे  

1  जब अल्लाह तआला ने सब नबियो से अहद लिया (हमारे हुज़ूर के तशरीफ़आवरी  के बारे में)(कन्जुल ईमान पारा 3 रुकुह 17 )

इस आयत ए करीमा में अल्लाह तआला ने हुज़ूर सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम की मिलाद का तज्किरा फ़रमाया 

2  बेशक तुम्हारे पास तशरीफ़ लाए तुम में से वो रसूल जिन पर तुम्हारा मशक्क़त में पड़ना गिरा है तुम्हारी भलाई के निहायत चाहने वाले मुसलमानो पर कमाल मेहरबान मेहरबान ! (कन्जुल ईमान पारा 11  रुकुह 17 )

3 बेशक तुम्हारे पास अल्लाह की तरफ से एक नूर आया और रोशन किताब (कन्जुल ईमान पारा 6 रुकुह 7 )

4 बेशक अल्लाह का बड़ा अहसान हुआ मुसलमानो पर की उन में उन्ही में से एक रसूल भेजा!(कन्जुल ईमान  पारा 4 रुकुह 8 ) 

5और हम ने तुम्हे न भेजा मगर रहमत सारे जहाँ के लिए (कन्जुल ईमान पारा 17 रुकुह 7 )

रसूलल्लाह ने खुद  अपने मिलाद का बयान फ़रमाया 

हदीस शरीफ!  यानि में उस वक़्त भी नबी था जब आदम  अलैहि सलाम मिटटी और खमीर में थे और में तुम्हे अपनी इब्तिदा की खबर  देता हु में दुआ ए इब्राहिम का नतीजा हु और में बशारते  ईसा हू  और में अपनी वालिदा का ख्वाब हु जो मरी वालिदा ने मरी विलादत के वक़्त देखा  था वालिदा माजिदा से मरी विलादत के वक़्त एसा नूर जाहिर हुआ था जिस की रौशनी से मुल्क शाम के मोह्हलात रोशन हो गए थे ( मिश्कात शरीफ स. 505 )

हज़रात ! इस हदीस शरीफ से साबित हुआ की खुद रसूलल्लाह  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम ने अपनी मिलाद का जिक्र फ़रमाया और इसी हदीस शरीफ में सरकार  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम ने अपनी विलादत का वक़्त रुनुमा होने वाले वाक़ियात और जाहिर होने वाले नूर का तज्क़िरा  भी फरमा  दिया तो साफ़ तोर  पर पता चला  की महफिले मिलाद को कन्हैया के जन्म  की तरह कहने वाला काफिर व मुर्तद है और  के नूरानी वाक़ियात को झूठा साबित करना और दज्जाल का गढ़ा हुआ कहना अल्लाह व रसूल  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम  को झूठा और दज्जाल कहना हुआ इस तरह की बात मुनाफ़िक़ और मुर्तद जहनमी ही कह सकता है ! 

हज़रात! इमाम नव्वी के उस्ताद इमाम अबु शामह मश्हूर मुहद्दिस इमाम सखावी ने मिलाद शरीफ के बे शुमार बरकात ब्यान किए और अल्लामा जोज़ी का कॉल मन्क़ूल है की महफिले मिलाद की खुसूसी बरकते में से यह हे  की जो इनको मुनाक़िद करता है इसकी बरकतों से सारा साल अल्लाह की हिफ़्ज़ो अमान में रहता है और वो अपने मक़सद व मतलूब में जल्दी हुसूल के लिए यह बसारत है (जीयउन्नबी जिल्द 2 स. 48 )

वहाबी देवबंदी का अक़ीदा की नबी को  सिफारशी और वकील जानने वाला मुशरिक है   
ऐ ईमान वालो ! ठन्डे दिल से सोचो और बाद अक़ीदा से हर हाल में परहेज़ को लाजिम कर लो

1 अहले हदीस कहलाने वाले के ईमान वहाबी देवबंदी तब्लीगी जमाअत के पेशवा मोलवी इस्माइल देहलवी

अल्लाह की बारगाह में नबी को सिफारशी ओए वालिक जानने वाले मुशरिक है (तक़वीयतुल ईमान स. 64 )

2 नबी कुढ़ अपना बचाव नहीं जानते तो दुसरो को क्या बचाएगे (तक़वीयतुल ईमान स. 64 )

3 किसी मुश्किल में नबी या वाली को पुकुरने वाला मुशरिक हो जाता है (तक़वीयतुल ईमान स. 76 )

4 रसूलल्लाह  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम अपनी बेटी फातिमा को क़यामत के दिन नहीं बचा सकते (तक़वीयतुल ईमान स. 79 )

5  जिसका नाम मुहम्मद या अली है वह किसी चीज़ का मालिक व मुख्तार नहीं (तक़वीयतुल ईमान स, 89 )

6  मोलवी इस्माइल ग़ज़नवी लिखता हे की जो सख्श या रसूलल्लाह या अब्दुल क़ादिर जिलानी पुकारे वह मुशरिक हॅ वह सख्स शिक़े अकबर का मुर्तक़िब है अगरचे उसका अक़ीदा यही हो की फाईले हक़ीक़ी फ़क़त रब्बुल इज्जत है एसे लोगो का खून बहाना जाएज़ है और उनका माल को लूट लेना मुबाह है (तोहफाए वहबिया 59  )

 7  यह कहना खुदा व रसूल चाहे तो फलां काम हो जाएगा कुफ्र व शिर्क है ( बेहिश्ती जेवर हिस्सा अव्वल स. 45 )

8  मोलवी अशरफ अली थानवी लिखता हे किसी के सामने झुक्ना सेहरा बाँधना अली बख्श , हुसैन बख्श ,अब्दुल्नबी ,नाम रखना शिर्क व कुफ्र है ( बहिश्ती जेवर हिस्सा अव्वल स. 45 )

9  मोलवी अशरफ अली थानवी के बड़े पेशवा देवबंदी जमाअत के पीर मोलवी रशीद अहमद गंगोही का खानदानी सजरह किताब तजकिरतुरसीद स. 13 पर लिखता हे  पिदरी  नसब नामा : रशीद अहमद बिन हिदायत अहमद बिन पीर बख्श बिन गुलाम हसन बिन गुलाम अली

मादरी नसब नामा : रशीद अहमद बिन करीमुनिशा बिन्त फरीद बख्श  क़ादिर बिन मुहम्मद सालेह बिन गुलाम मुहम्मद

हज़रात! गौर  कीजिए की रशीद अहमद गंगोही के दादा का नाम पीर बख्श था   नाम फरीद बख्श है इसी तरह वहाबी देवबंदी के पीर रशीद अहमद गंगोही के आबा व अज्दाद में कितने एसे हे जो मोलवी अशरफ अली थानवी के फतवे के मुताबिक काफिर और मुशरिक हुए !

वहाबी  मज़हब के बानी मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब नज्दी का अक़ीदा

नबी अकरम  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम से तवस्सुल करने वाला काफिर हो जाता है (अद्दरुसुन्निया स. 39 )

वहाबी नजदियो का अक़ीदा है की या रसूलल्लाह  कहने वाला काफिर है

1 या रसूलल्लाह कहने वाला काफिर है (तोहफा ए वहबिया स. 68 )

2 फौत शुदा अम्बिया व ओलिया को पुकारना और उनसे दुआ व सफाअत की इल्तिज़ा करना शिर्क है (किताबुल वसीला स. 63 )

3 या रसूलल्लाह का नारा लगाना शिर्क व हराम है (सहीफ़ा ए अहले हदीस कराची स. 23.  15 मुहर्रम 1374 हि.)

4 या अल्लाह के सात या मुहम्मद शिर्क है (सहीफ़ा ए अहले हदीस कराची स. 23 . 15 मुहर्रम 1374 हि )

5 अहले हदीस कहलाने वाले वहाबी मोहद्दिस अब्दुल्ला रोपडी लिखता है

अस्सलातो वस्सलामो अलैका या रसूलल्लाह

अस्सलातो वस्सलामो अलैका या हबीब अल्लाह

पड़ना हर हाल में बुरा हे (रिसाला सिमाअ मोता स. 15 )

6 हमारे हाथ की लाठी सरवरे क़ायनात  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम से जयादा नफा देने वाली है हम इस (लाठी ) से कुत्ते को दफा कर सकते हे (अस्साहबुकसिम स. 47 )

7  मने रसूलल्लाह  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम को देखा की आप मेरे को पुल  सिरात पर ले गए और मने देखा की आप पल सिरात से गिर रहे हे तो मने आप को गिरने से बचा लिया (मुबशिराते )

ईमान वालो का अक़ीदा की नबी सिफारशी और वकील है 

हदीस शरीफ : महबूबे ख़ुदा  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम  फ़रमाते है 

यानि अल्लाह तआला ने जब अर्श बनाया तो उस पर नूर के कलम से जिसका तूल मशरिक से मगरिब तक था 

अल्लाह तआला के सिवा कोई मअबूद नहीं मुहम्मद  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम  अल्लाह के रसूल है इन्ही के वास्ते से लूगा और इन्ही के वास्ते से दूगा (अल अम्नो वल उला स. 33 )

 हमारे नबी की शफाअत से गुनाहगार जहन्नम से निकाल लिया जाएगा 

हदीस शरीफ: हज़रत उबादह बिन सामित रज़िअल्लहुअन्हु से रिवायत है की रसूलल्लाह  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हे 

यानि बेशक मै रोजे क़ियामत तमाम जहान वालो का सरदार हूँ और मेरे  हाथ में लिवॉउल हम्द होगा कोइ एसा न होगा जो मेरे झंडे के नीचे न होगा में चलुंगा और लोग मेरे साथ होगे यहाँ तक की जन्नत के दरवाजे पर पहुंच कर दरवाजा खुलवाऊगा सवाल होगा कौन हे में फ़रमाउगा मुहम्मद ( सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम )  मरहबा मुहम्मद  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम को फिर जब में रब तआला को देखुंगा तो उसकी बारगाह में सज्दा करुगा  हुकुम होगा ए महबूब ( सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम ) कहो तुम्हारी मानी जाएगी शफ़ाअत करो तुम्हारी शफ़ाअत कुबूल होगी पस जो लोग जहनम में जा चुके थे वह अल्लाह की रहमत और मेरी शफ़ाअत से दोजक से निकाल दिए जाएंगे ।(अल अमनो वल उला स. 87 बा हवाला मुस्तदरिक लिल हाकिम )

हज़रात! वहाबियों पर अल्लाह की लअनत जिनका अक़ीदा हे की मने रसूलल्लाह  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम को पुल सिरात पर गिरने से बचाया माज़ अल्लाह सद बार माज़ल्लाह 

हज़रात :इन दोनों हदीस से जाहिर और साबित होता हे की खुद अल्लाह तआला अपने महबूब रसूल  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम के वसीले से अता  फ़रमाता हे और अल्लाह तआला की अता से  रसूलल्लाह  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम जहनम से बचते हे  और जन्नत अता फरमाते है तो साबित हुआ की जो रसूलल्लाह  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम अपनी उम्मत को अज़ाब से बचाय  गए वह आक़ा क्या अपनी बेटी फ़तिमातुर्ज़ेहरा रज़िअल्लहुअन्हा को न बचाय गे उनके लिए तो आक़ा  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया की मेरी बेटी फातिमा जन्नती ओरतो की सरदार है !

                           हमारे नबी जन्नत बाटते है

हदीस शरीफ : हमारे आक़ा  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रत राबिया बिन कबह अस्लमी से इरशाद फ़रमाया ए राबिया मुज़से जो मांगना हो माग लो  हज़रत राबिया अर्ज़ करती है में जन्नत में आप का साथ  मांगती हु (सहीह मुस्लिम शरीफ,अबु दाऊद शरीफ,इब्ने माज़ा मुअज्जम कबीर तबरानी अल अमनो वल उला स. 110 )

हदीस शरीफ से साफ़ जाहिर हो गया की हुज़ूर  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम खुद फरमाते हे मुज़से मागो और सहाबी हज़रत राबिया रजिअल्लाह अन्हो ने मालिके जन्नत रसूलल्लाह  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम से जन्नत भी माग ली और जन्नत में सरकार  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम की रिफाकत तालाब की और दोनों नेअमतें उनको हासिल भी हो गई 

तो मालूम हुआ की रसूलल्लाह  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम से मांगना शिर्क व बिदअत नहीं बल्कि सहाबी की सुन्नत हे जो हदीस से साबित हे 

या रसूलल्लाह कहना कुफ्र नहीं है बल्कि सहाबा की सुन्नत हे

हुज़ूर  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम ने एक नाबीना को दुआ तालीम फ़रमाई 

ए अल्लाह में तुज से मागता हूँ  और तेरी तरफ तव्वजो करता हु  तेरे नबी मुहम्मद  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम के वसीले से जो रहमत वाले नबी हे या रसूलल्लाह में हुज़ूर के वसीले से अपने रब की तरफ अपनी हाजत में तव्वजो करता हू ताकि मेरी हाजत पूरी हो ए अल्लाह उन्हें मेरा सफ़ीअ कर उनकी सफ़ात मरे लिया क़ुबूल फरमा (नसाई तिर्मिज़ी इब्ने खुज़ैमा तबरानी हाकिम बेहकी अल अमनो वल उला स. 113 )

हज़रात ! इस हदीस शरीफ से साफ़ तोर पर मालूम हुआ की सहाबा ए किराम हुज़ूर के वसीले से दुआ करते थे और या मुहम्मद या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम पुकारना शिर्क व बिदअत नहीं बल्कि सहाबा की सुन्नत है 

बादे विसाल भी सहाबा या रसूलल्लाह कहते थे

हदीस शरीफ : यानि सहाबा किराम जब रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम की कब्रे अनवर पर हाजिर होते तो अस्सलामो अलैका या रसूलल्लाह कहते (मोसन्नफ अब्दुलरज़ाक जिल्द 3 स. 576 )

हज़रात! इस हदीस शरीफ से मालूम हुआ की महबूबे ख़ुदा रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम के विसाल शरीफ के बाद भी सलाम करना और या रसूलल्लाह कहना सहाबा ए किराम की सुन्नत है 

शाह वलीयुल्लाह मोहद्दिसए देहलवी रहमतुल्लाह अलैह फरमाते है

मुसीबतो में या अली. या अली, या अली  पुकारोगे तो उन्हें अपना मददगार पाओगे (अल अमनो वल उला स. 13 )

हज़रात: गैर मुकलिद वहाबी देवबंदी यह सब के सब हज़रत शाह वालीयुल्लाह मोहद्दिस देहलवी को अपना बुज़ुर्ग मानते है तो उनसे कहो शाह साब ने या अली या अली पुकारने की तालीम दी है तो उन पर कुफ्र और शिर्क का हुकुम लगाए

अस्सलातो अस्सलामो अलैका या रसूलल्लाह कहना हदीस से साबित है

हदीस शरीफ : मश्हूर मोहद्दिस हज़रत अल्लामा काजी इयाज़ रहमतुल्लाह अलेही नक़ल फरमाते है की अमीरुल म मोमिनीन मौला अली शेरे ख़ुदा रज़ियल्लाहु अन्हु रावी है वह फरमाते है मुज़े वह पत्थर अभी तक याद है जिसके पास से में हुज़ूर सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम के साथ गुजरा करता था और पत्थर बुलंद आवाज़ से कहते थे 

अस्सलातो वस्सलामो अलैका या रसूलल्लाह

अस्सलातो वस्सलामो अलैका या हबीब अल्लाह

(शिफ़ा शरीफ)

हज़रात: इस हदीस से साफ़ तोर पर जाहिर और साबित  होता है की

अस्सलातो वस्सलामो अलैका या रसूलल्लाह

अस्सलातो वस्सलामो अलैका या हबीबल्लाह

पड़ना बुरा अमल नहीं है अगर बुरा अमल होता तो शेरे ख़ुदा मौला अली न पड़ते और न रिवायत फरमाते और मोहद्दिसे किराम हदीस की किताबो में लिखते  भी नहीं

तो मालूम हुआ की वहाबी देवबंदी का मज़हब ही बुरा है

अस्सलातो वस्सलामो अलैका या रसूलल्लाह

अस्सलातो वस्सलामो अलैका या हबीबल्लाह

पड़ना हर हाल में अच्छा अमल हे और सहाबा की सुन्नत है

हज़रात: हिन्द के राजा हमारे प्यारे ख़्वाजा गरीब नवाज़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने कुतुबुल अक़ताब हुज़ूर गौसे आज़म रज़ियल्लाहु अन्हु की शाने गौसियत को यूँ बयान फ़रमाया

या गोसे मुअज़्ज़म नूरे हुदा मुख्तारे नबी मुख्तारे ख़ुदा (अहले सुन्नत की आवाज़ सन 2008 स. 295 )

वहाबी देवबंदी का अक़ीदा की रसूलल्लाह मर कर मिट्टी में मिल गए

अहले हदीस कहलाने वाले वहाबी देवबंदी के पेशवा मोलवी इस्माइल देल्हवी लिखता है

1  रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम मर कर मिट्टी में मिल गए (तक़वीयतुल ईमान स. 133 ) 

2 नबी मर गया वह भी कभी जिन्दा था और ब शरीयत की कैद में गिरफ्तार (तक़वीयतुल ईमान स. 132 )

3  हमारा अक़ीदा है की आँ हज़रत सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम दूसरे इंसानो की तरह वफ़ात पा गए (अखबार अहले हदीस अमृतसर 25 अप्रैल 1941 )

4  वहाबी देवबंदी मोलवी हुसैन अहमद मदनी टांडवी लिखता है रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम का वफ़ात के बाद हम पर अब कोई हक़ नहीं और न कोई अहसान न कोई फायदा है (अश्शहाबुस्साकिबस. 47 )

ए ईमान वालो इन्साफ से फैसला करके बताओ की क्या इसी अंदाज़ और तरीका से महबूबे ख़ुदा सय्यदे आलम सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम को याद किया जाता है इस अंदाज़ से भाई और दोस्त व अहबाब यहाँ तक की नौकर व गुलाम के लिया भी नहीं बोला जाता 

आप समझ गए  होगे की वहाबी देवबंदी अल्लाह व रसूल सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम की बारगाह के बड़े ही बे अदब और गुस्ताख़ है 

ईमान वालो अक़ीदा नबी जिन्दा है  

हज़रात: नबीए रहमत व बरकत सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम को मुर्दा कहने वालो का ईमान व इस्लाम मर चूका है 

हमारे प्यारे आक़ा नबी ए रहमत व बरकत सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम अल्लाह तआला की अता से जिन्दा थे जिन्दा है और जिन्दा रहेंगे 

आला हज़रत इमाम  अहमद रज़ा  रज़ियल्लाहु अन्हि फरमाते है

तू जिन्दा हे वल्लाह तू जिन्दा हे वल्लाह

मेरे चश्मे आलम से छुप जाने वाले

हदीस शरीफ : हज़रत अबु दर्दा रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत है की रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया 

बेशक अल्लाह तआला ने जमीन  पर हराम कर दिया है कि अम्बिया किराम के जिस्मो को खाए लिहाज़ा अल्लाह के नबी जिन्दा हे रिज्क दिए जाते है (अबु दाऊद शरीफ जिल्द 1 स. 157  इब्ने माज़ह स. 76 मिश्कात शरीफ स. 121 )

रसूलल्लाह बादे विसाल उम्मत को देख रहे है

हदीस शरीफ : मश्हूर मोहद्दिस इमाम मुहम्मद इब्ने हाज मक्की और जलिलुल्क़द्र मोहद्दिस इमाम अहमद कस्तलानी रहमतुल्लाह अलैह लिखते है

रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लमकी हयात और वफ़ात में कुछ फर्क नहीं की वह अपनी उम्मत को देख रहे है और उनकी हालतो उनकी नियतो और उनके इरादो और उनके दिलो के ख़यालो को पहचानते है यह सब हुज़ूर सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम को एसा रोशन है जिसमे कुछ भी पोशीदगी नहीं ( मुद्खल जिल्द 1 स. 215 शरह मवाहिब जिल्द  8  स. 348 )

मश्हूर बुज़ुर्ग हज़रत शेख अब्दुल हक़ मोहद्दिसे देहलवी रजिअल्लाहहु अन्हु  फरमाते है

रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम दुनियावी जिंदगी की हक़ीक़त के  साथ है `(अशिअतुल लम्आत जिल्द 1 स. 576 )

मश्हूर मोहद्दिस हज़रत अल्लामा मुल्ला अली कारी रामतुल्लाह अलैह फरमाते है  यानि अम्बिया किराम की दुनियावी जिंदगी और विसाल के बाद की जिंदगी में कोई फर्क नहीं इसीलिए कहा जाता है की ओलिया किराम मरते नहीं बल्कि एक घर से दूसरे घर की तरफ मुन्तक़िल हो जाते है (मिरक़ात ज़िल्द 2 स. 212 )

कौन  कहता हे की मोमिन मर गया 

 कैद से छूटा वह अपने घर गया 

ईमान वालो का अक़ीदा की रसूलल्लाह का एहसान हर मख्लूक़ पर है

ए ईमान वालो ! महबूबे ख़ुदा सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लमके सदके तुफैल में सारा आलम पैदा किया गया इस लिए आलम के जर्रे जर्रे पर महबूबे खुद रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम का एहसान अज़ीम है और अव्वलीन और आखिरिन ने इस इस अज़ीम एहसान को माना और तस्लीम किया 

जलिलुल्क़द्र  मोहद्दिस हज़रात अल्लामा मुल्ला अली कारी रहमतुल्लाह फरमाते है महबूबे ख़ुदा सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम का एहसान व महरबानी हर मख्लूक़ पर है ख़ास तोर पर हर मोमिन पर है (मिरकात शरह ज़िल्द 1 स. 64 )

इस हदीस शरीफ से मालूम हुआ की हमारे प्यारे नबी सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम का एहसान हर मख्लूक़ पर हे  ख़ास तोर पर मोमिन पर मगर रहीमो करीम नबी  सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम  का एहसान मोमिन मानता है काफिर और मुनाफ़िक़ नहीं मानते 

वहाबी का अक़ीदा की नबी की कब्र बूत है

अदल और इन्साफ की आँख से और ईमान की रौशनी में दिल को थाम कर बगोर पढ़िए वहाबी नज्दी के नजदीक महबूबे ख़ुदा सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम की कब्रे अनवर मज़ारे अक़दस की हक़ीक़त व हैसियत क्या है 

1 हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम की कब्रे मुक़दस हर लिहाज़ा से बुत है ( हाशिया शरहुस्सुदूर स. 25 मतबूआ सऊदी )

2  वहाबी इमाम मुहम्मद बिन अब्दुल वहाब नज्दी के पोते  अब्दुल रहमान नज्दी ने अपने दादा की किताब अतौहीद की शरह फत्हुल मजीद में लिखा  की नबी सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम का रोज़ा शिर्क व इल्हाद का बहुत बड़ा ज़रिया है !(फ़तहुल मजीद शरह कितबुतौहीद स. 209 ) 

वहाबी का अक़ीदा नबी की कब्र गिरा देना वाजिब है

1 पगैम्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लमकी कब्र को गिरा देना वाजिब है ( उरफ़ुल जादी स. 61 ) 

2 रसूलल्लाह और अम्बिया किराम की जियारत के  लिए जाने वाला मुशरिक है (फ़तहुल मजीद शरह कितबुतौहीद स. 215 )

3 कस्दन कब्रे नबवी पर सलाम के लिए जाना मना है ( हिदायतुल मुस्तफ़ीद जिल्द 1 स. 811 )

4 गैर मुकलिद के मुहद्दिस हाफिज अब्दुल्लाह रोपडी लिखता है

रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम की कब्र या रोज़े की जियारत के लिए  जाना सराहतन मना है (सफ़िहे अहले हदीस कराची स. 23 )

5 रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लमकी कब्रे मुबारक के पास अपने लिया दुआ मांगना बिदअत है (नहजुल मक़बूल फार्सी स. 43 )

ईमान वालो का अक़ीदा की नबी की कब्र पर गुम्बंद हदीस से साबित है

प्यारे सुन्नी मुसलमान भाइयो होशियार ! यानि जिस हदीस शरीफ में यह हुकुम हे की पक्की कब्रो को गिरा दो इससे मुश्रिकीन की कब्रो को गिराने का हुकुम है न की अम्बिया व ओलिया की कब्रो को गिराने का हुकुम दिया मगर वहाबी देवबंदी इस हदीस शरीफ को अम्बिया व ओलिया की कब्रो और मज़ारों पर चस्पा करते नज़र आते है

हमारे प्यारे नबी सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम के जाहिरी ज़माने में अम्बिया किराम और ओलिया इजाम की कब्रो पर कुब्बे और गुम्बंद बने हुए थे 

1 हदीस शरीफ : हज़रात अब्दुल्लाह रज़ियल्लाहु अन्हु फरमाते है

रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला अलैहि वसल्लम ने हज़रत आदम अहलेहिसलाम के कुब्बे से टेक लगा कर हमको खिताब फ़रमाया तो इरशाद फ़रमाया जन्नत के सिवाए मुसलमान आदमी के कोई सख्स दाखिल नहीं होगा ( सहीह मुस्लिम शरीफ जिल्द 1 स. 117 )

 

सुन्नी और वहाबी की पहचान 

Bismillah

ऐ ईमान  वालो यकिन  जान लो की हर फ़र्ज़ से बड़ा और एहम फ़र्ज़ ईमान की हिफाज़त है।

और ईमान मेहबूब ऐ खुदा  नबी ऐ करीम (सल्लल्लाहो तआला व सल्लम)  की गुलामी और मोहब्बत की नाम है।

(हदीस शरीफ )

हजरत अनस रज़िअल्लाहु तआला अन्हो से रिवयत की है रसूलल्लाह (सल्लल्लाहो तआला सल्लम) ने फ़रमाया की कोई शक्श उस वक़्त तक मोमिन नही हो सकता जब तक की में  उस के माँ बाप बेटे और तमाम लोगो से ज्यादा मेहबूब न हो जाँऊ   ।।

(बुखारी जिल्द 1 स 7 मुस्लिम जिल्द 1 स 49)
आशिक़े रसूल अला हज़रत पेशवाए अहले सुन्नत इमाम अहमद रजा फ़ज़िले बरेलवी रहमतुल्लाह तआला अलैह फरमाते हे
(अल्लाह की सर ता ब कदम शान हे यह इन सा नहीं वह इंसान हे यह कुरआन तो ईमान बताता है इन्हे ईमान यह कहता हे मेरी जान हे यह)
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क्यों रज़ा आज गली सुनी हे।
उठ मरे धूम मचाने वाले।
डाल दी क़ल्ब में अज़मते मुस्तफा
सय्यिदि आला हज़रत पे लाखों सलाम।।

हज़रात ! आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फ़ाजीले बरेलवी  रहमतुल्लाह तआला अलैह ने पूरी ज़िन्दगी अल्लाह व रसूल जल्ला शानुहु वसल्लल्लाहो तआला सल्लम की इताअत व फरमा बरदारी में गुजारी। आला हज़रत रज़िअल्लहो तआला अन्हो महबूबे ख़ुदा रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला सल्लम पर जान व दिल से फ़िदा व क़ुरबान थे
फरमाते हे या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला सल्लम
(दहन में जुबां तुम्हारे लिए बदन में हे जाँ तुम्हारे लिए
हम आए यहाँ तुम्हारे लिए उठे भी वहाँ तुम्हारे लिए)(हदाइके बक्शीश)
आला हज़रत शरीअत व सुन्नत के जबरदस्त आलिम थे सहाबा ए किराम और अहले ब बैंत के आशिक़े ए सादिक और वफादार गुलाम थे
अहले सुन्नत का बेड़ा पार अस्हाबे हुज़ूर
नज्म हे और नाव हे इतरत रसूलल्लाह की
(हदाइके बक्शीश)
और फरमाते हे
उनके मोला की उन पर करोड़ो दुरुद
उनके अस्हाबो इतरत पे लाखों सलाम
(हदाइके बक्शीश)
आला हज़रत ख़ुलफ़ाए राशिदीन हज़रत अबु बकर सिद्दीके अकबर। हज़रत उमर फ़ारूके आज़म. हज़रत उस्मान ग़नी। हज़रत अली शेरे ख़ुदा रज़ियल्लाहु तआला अन्हुम के सच्चे जाँ निसार और मदह ख़्वाँ थे

खलीफा ए अव्वल ! अबु बकर सिद्दीके अकबर रज़ियल्लाहू तआला अन्हो की शान यूँ बयान फरमाते हे
सायए मुस्तफा मायए इस्तफ़ा
इज्जो नाज़े ख़िलाफ़त पर लाखों सलाम

ख़लीफ़ए दोंम! वह उमर जिसके आदा पे शैदा सकर
उस ख़ुदा दोस्त हज़रत पे लाखों सलाम

ख़लीफ़ए सोम ! हज़रत उस्मान गनी नूरऐन रज़ियल्लाहू तआला अन्हो के मक़ाम व मरतबा को यूँ बयान फ़रमाया

दुर्रे मन्सूर कुरआँ की सिलक बही
जौजे दो नूर इफ़्फ़त पे लाखो सलाम

खलीफा ए चाहरूम हज़रत मोला अली शेरे खुदा रज़ियल्लाहू तआला अन्हो की इज्जत व बुजुर्गी का ख़ुत्बा यूँ पड़ते है

शेरे समशीर जन शाहे खैबर शिकन
परतवे दस्ते कुदरत पे लाखो सलाम

अहले बैंत पाक आले रसूल हज़रत सय्येदा फातिमातुज्जोहरा हज़रत सैय्यदना इमाम हसन इमाम हुसैन रज़ियल्लाहू तआला अन्हो अज़मीईन की क़राबत की अज़मत को यूँ बयान फ़रमाया

तेरी नस्ले पाक में है बच्चा बच्चा नूर का
तू हे ऐने नूर तेरा सब घराना नूर का

और फरमाते हे

और जितने हे शहजादे उस शाह के
उन सब अहले मकानत पे लाखो सलाम
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ईमान वालो का अक़ीदा की नबी ख़ुदा का नूर है : ए ईमान वालो मुलाहिज़ा फरमाए की जिनके दिलो में रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला सल्लम से बुग्ज़ व इनाद था उन्होंने रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला वा सल्लम को नूर मानना तो दूर नूर मानने वालो को काफिर तक लिख दिया और जिनका सीना इश्क़ और मोह्हबत का मदीना हे यही आशिक़े रसूल आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा रहमतुल्लाह तआला अलैह  लिखते है की हमारे रसूल सल्लल्लाहो तआला व सल्लम नूर हे और अपने आक़ा सल्लल्लाहो तआला व सल्लम की गुलामी का हक़ अदा करते हुए क़ुरआने मजीद से सबूत पेश करते हे

हजरात ! अल्लाह पाक ने क़ुरआने मजीद में हमारे हुज़ूर सल्लल्लाहो तआला व सल्लम को नूर फ़रमाया हे

तहक़ीक़ आया तुम्हारे पास ख़ुदा की तरफ से एक नूर और एक किताब रोशन (पारा 6 रुकूअ 7)

आला हज़रत फरमाते हे की उलमा फरमाते हे की यहाँ नूर से मुराद नबी पाक सल्लल्लाहो तआला व सल्लम हे
(मजमूअए रसाइल मसअला नूर और साया स.62)
तमाम मुहद्दिस और आइमा फरमाते हे की आयत करीमा में नूर से मुराद हुज़ूर सरापा नूर सल्लल्लाहो तआला व सल्लम हे
(तफ़्सीर इब्ने जोज़ी जिल्द 2 स. 317)

हज़रात हुज़ूर सल्लल्लाहो तआला व सल्लम को अल्लाह तआला का नूर न मानना कुरआन का इन्कार है जो कुफ्र है!
हदीस शरीफ : हमारे हुज़ूर सल्लल्लाहो तआला व सल्लम ने इरशाद फ़रमाया ऐ जाबिर अल्लाह तआला ने बेशक सबसे पहले तेरे नबी के नूर को अपने नूर से बनाया !

इस हदीस को हज़रत इमाम बुखारी रहमतुल्ला आलें के दादा उस्ताद ने मोसन्नफ अब्दुलरज्जाक में अल्लामा कस्तलानी मवाहेबुल लदुन्नियाह शरीफ जिल्द 1 स. 9 पर अल्लामा हल्बी ने सिरते हल्बिया जिल्द 1 स,37 पर अल्लामा इब्ने हज़र मक्की ने फतावा हदीसियाह जिल्द 1 स.51 अल्लामा फ़ासी ने मतालेउल मसरात स्. 210 पर अल्लामा जुर्कानी शरीफ जिल्द 1 स. 46 पर अल्लामा यूसुफ नाबाहनी हुज़्ज़तुल्लाह अलल आलमीन स्.28 पर अल अनवारुल मोहम्मदिय स. 9 पर लिखा हे

1 हज़रत क़ाज़ी इयाज़ रहमततुल्लाह ने लिखा की जब आप सल्लल्लाहो तआला व सल्लम कलाम फरमाते तो दाँतो से नूर छनता नज़र आता
(शिफ़ा शरीफ जिल्द 1 स.55 तिर्मिज़ी शरीफ स. 302 )

2 और हुज़ूर सल्लल्लाहो तआला व सल्लम का चेहरा चोदहवी रात के चाँद की तरह चमकता
(शिफ़ा शरीफ जिल्द 1 स. 51 )

3 और अल्लामा जलालुद्दीन सुवती रहमततुल्लाह लिखते हे जब हुज़ूर सल्लल्लाहो तआला व सल्लम हसते दीवारे रोशन हो जाती (खसाइके कुबरा जिल्द 1 स. 179 )

4 मश्हूर आशिक़े रसूल इमाम युसूफ नबहानी रहमतुल्लाह लिखते हे की जब हुज़ूर सल्लल्लाहो तआला व सल्लम पैदा हुए उनके नूर से मशरिक़ से मगरिब तक मुन्नवर हो गया (अनवारे मोहम्मदिया जिल्द 1 स. 240)

5 मश्हूर मोहद्दिस इमाम जलालुद्दीन सुवती रहमतुल्लाह फरमाते हे जब हुज़ूर सल्लल्लाहो तआला व सल्लम पैदा हुए तमाम दुनिया नूर से भर गई (खसाइके कुबरा जिल्द 1 स. 118 )

6 हुज़ूर सल्लल्लाहो तआला व सल्लम की वालिदा माज़िदा हज़रत आमिना तय्यिबा रजिअल्लाह हु अन्हा फरमाती हे मैने  उसके सर से एक नूर बुलंद होता देखा की आसमान तक पंहुचा (खसाइके कुबरा जिल्द 1 स. 122 )

7 उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा सिद्दीका रजिअल्लाह हु अन्हा फरमाती हे की में कपडा सीती थी सुई गिर पड़ी तलाश की न मिली इतने में रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला व सल्लम तशरीफ़ लाए हुज़ूर के नूर की शुआ से सुई जाहिर हो गई
( तरीक़ इब्ने असाकर बा हवाला खसाइके कुबरा जिल्द 1 स. 156 )

8 जलिलुक़द्र मोहद्दिस इमाम मुहम्मद अल मेहंदी अलफासी लिखते हे की नबी सल्लल्लाहो तआला व सल्लम के नूर से अधेरा घर रोशन हो जाता (मतालेउल मसर्रत स. 313)

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वहाबी नबी सल्लल्लाहो तआला व सल्लम को नूर नहीं मानता

1 अहले हदीस मोलवी अहमद दीन का अक़ीदा हे की नबी को नूर समझने वाले और यहूदो में कोई फ़र्क़ नहीं
(बुरहानुल हक़ स. 101 )
2 अहले हदीस कहलवाने वाले का अक़ीदा हे रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो तआला व सल्लम को ख़ुदा का नूर मानना कुफ्र हे
(सहीफ़ए अहले हदीस कराची स. 5 28 नवम्बर 1954 )
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वहाबी देवबंदी का अक़ीदा हे की नबी को इल्म ए ग़ैब नहीं
1 इमामूल वहबिया मोलवी इस्माइल देहलवी का अक़ीदा की रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला व सल्लम को न कुछ ताक़त हे न कुछ इल्म ए ग़ैब! उनकी ताक़त का तो ये हाल हे की अपनी जान तक को भी नफा व नुक्सान के मालिक नहीं तो दुसरो को क्या नफा पंहुचा सकते हे और उन्हें इल्म ए ग़ैब होता पहले हर काम का अंजाम मालूम कर लेते और अगर भला मालूम होता तो उस काम को कर लेते और अगर बुरा मालूम होता तो क्यों उस बुराई में कदम रखते अल ग़रज़ उनको न कुछ ताक़त हे और न उनको ग़ैब हे

(तक़वीयतुल ईमान स. 41 )
2 रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला व सल्लम को अपना हाल की क़ब्र में और क़ियामत के दिन मरे सात अच्छा होगा या नहीं कुछ मालूम नहीं (तक़वीयतुल ईमान स. 41 )
3 वहाबी देवबंदी के पेशवा मोलवी खलील अहमद अम्बेटवी का अक़ीदा रसूलल्लाह को दीवार के पीछे का इल्म नहीं और लिखता हे की शैतान और मलकुल मोत का इल्म कुरआन से साबित हे और रसूलल्लाह का साबित नहीं और जो रसूलल्लाह का इल्म साबित करे वो मुशरिक हे (बराहिने कतिया स. 51 )

और मोलवी खलील अहमद अम्बेटवी इस किताब में लिखते हे की एक शख्श ने हुज़ूर सल्लल्लाहो तआला व सल्लम को उर्दू में बात करते सुना ख़्वाब में देखा तो पूछा की आप को यह कलाम कहा से आ गई आप तो अरबी हे तो फ़रमाया की जब से मेरा उलमा ए देवबंद सेव हमारा मामला हुआ हे हमको ये जबान आ गई
(बराहिने कतिया स. 26 )

3 गैर मुकलिद अहले हदीस कहलाने वाले का अक़ीदा हे की : नबी हो या वाली या पीर हो या फरिश्ता हो किसी के लिया ग़ैब मानना शिर्क हे (मोलवी रफ़ीक़ खान पिसरवी इस्लाहे अक़ाईद स. 153 )

4 जमाते इस्लामी के बानी और अमीर मोलवी अबुल आला मौदूदी का अक़ीदा हे : रसूलल्लाह अनपढ़ जंगली और देहाती थे (माज़ल्लाह)
(तफहीमात जिल्द स. 249 )

14 गैर मुकलीद और अहले हदीस कहलाने वालो के मोहद्दिस मोलवी नज़ीर हुसैन देलहलवी का अक़ीदा हे : उम्मुल मोमिनीन हज़रात आयशा सिद्दीका रज़िअल्लहुअन्हा का हार घूम हो गया तो रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला व सल्लम को आयशा के मुतल्लिक गुनाह का शक उस्वक़्त तक रहा की जब तक की अयात बरात नाजिल न हुई (फतवा नज़ीरिया जिल्द 1 स. 24 )

! ईमान वालो का अक़ीदा !

हज़रात अल्लाह तआला ने खुद अपने महबूब रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला व सल्लम के इल्म ग़ैब की शान व अज़मत को क़ुरआन मजीद में बयान फ़रमाया है

1 ग़ैब का जानने वाला अपने ग़ैब पर किसी को मुसल्लत नहीं करता सिवाए अपने पसंदीदा रसूलों के (कन्जुल ईमान पारा 29 रुकुह 12 )

2 क़ुरान मजीद में अल्लाह पाक इरशाद फ़रमाता हे :और यह नबी ग़ैब बताने में बख़ील नहीं (कन्जुल ईमान पारा 30 रुकुह 6 )

3 और तुम्हे सीखा दिया जो तुम न जानते थे और अल्लाह का तुम पर बड़ा फज़ल हे (कन्जुल ईमान पारा 5 रुकुह 14 )

हदीस शरीफ

1 मुझसे जो पूछना हे पूछ लो (सही बुखारी जिल्द 1 स. 19 )

2 रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला व सल्लम ने एक बार हम में खड़े हो कर इब्तिदाय आफ़रिनिश से लेकर जन्नती के जन्नत और दोज़ख़ियों के दोज़ख में जाने का हाल हम से बयान फ़रमाया (सही बुखारी जिल्द २ स. 1083 )

3 हज़रत अबु ज़ैद रजिअल्लाह अन्हु से रिवायत हे की : रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला व सल्लम हम को जो कुछ भी पहले हो चूका और जो भी आइन्दा होने वाला था तमाम बयान फ़रमा दिया (सही मुस्लिम जिल्द 2 स. 290 )

4 हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत हे की रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला व सल्लम ने फ़रमाया जो कुछ आसमान और जामीन में हे मरे इल्म में है ( तिर्मिज़ी शरीफ मिश्कात शरीफ स. 70 )

आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फ़ज़िले बरेलवी रज़ियल्लाहु अन्हु लिखते हे
हज़रात इमाम बुखारी ने इस हदीस को सही फ़रमाया (इम्बॉउल मुस्तफा बिहाले सिरे व इख्फा स.5 )

5 इमाम बुखारी तहरीर फरमाते हे की: रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला व सल्लम सहाबा के सात गुजर रहे थे की दो कब्रो के पास खड़े हो कर फ़रमाया की इन क़ब्र वालो को अज़ाब हो रहा हे एक पेशाब के छिटो से नहीं बचता था और दूसरा ग़ीबत करता था ( सही बुखारी शरीफ स. 35 मिश्कात शरीफ स. 42 )

हज़रात हमारे प्यारे आक़ा रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला व सल्लम के इल्म ए गैब के सबूत में यह चंद हदीस बुखारी शरीफ मुस्लिम शरीफ मिश्कात शरीफ के हवाले के सात पेश कर दी गई हे
वरना सिहाह सित्ता की किताबो के अलावा मुवाहिबुल लदुन्निया शरीफ, शिफ़ा शरीफ ,नसीमुरियाज़ , मदरेजुन्नबुव्वत , यह सुब हदीस की किताबे और इनके अलावा मोहद्दिसो व आइमा की किताबें सल्लल्लाहो तआला व सल्लम के इल्म ए गैब की शान व अज़मत को जाहिर और साबित करती नज़र आती है

हज़रात इल्म ए गैब के बारे में तफ़्सीली मालूमात के लिया आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फ़ज़िले बरेलवी  रहमतुल्लाह तआला अलैह की किताब ख़ालिसुल एतिक़ाद का मुत्तला कीजिये

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मुनाफ़िक़ ने कहा की मुहम्मद सल्लल्लाहो तआला व सल्लम गैब की बात क्या जाने,

हदीस शरीफ हे तफ़सीरे इमाम तबरी में और तफ़सीरे दुर्रे मंसूर में हज़रत इमाम बुखारी और हज़रत इमाम मुस्लिम के उस्ताद हज़रत अबु बक्र बिन अबी शैबह से रिवायत हे और दूसरे आइमा ए किराम व मोहद्दिसिन इजाम हज़रत अब्दुल्लाह बिन अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हु के ख़ास शार्गिद सैयदना इमाम मुजाहिर रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत करते हे की फ़रमाया अल्लाह तआला के फरमान की तफ़्सीर में की मुनाफीक़ीन में से एक मुनाफ़िक़ ने कहा की मुहम्मद सल्लल्लाहो तआला व सल्लम हम से बयान फरमाते हे की फला की ऊंटनी फला वादी में है भला वह गैब की बात क्या जाने (ख़लिसुल एतिक़ाद स.15)

हज़रात अल्लाह ने मुनाफ़िक़ों की पहचान बयान फरमा दी की नबी सल्लल्लाहो तआला व सल्लम के गैब का इंकार करना सहाबा ए किराम के ज़माने में मुनाफ़िक़ों की अलामत थी सहाबा किराम अपने नबी सल्लल्लाहो तआला व सल्लम के लिया गैब लाजमी तोर पर मानते थे और मुनाफ़ी क्यू इंकार करते थे इस दोर में भी ईमान वाले अपने रहीम व करीम सल्लल्लाहो तआला व सल्लम के लिया इल्म इ गैब मानते हे और वहाबी देओबंदी तब्लीगी इल्म ए गैब का इंकार करते हे तो अल्लाह तआला ने क़ुरआन मजीद में फतवा सादिर फरमा दिया जो भी नबी पाक सल्लल्लाहो तआला व सल्लम के इल्म इ गैब का इंकार करे वो मोमिन नहीं बल्कि काफिर और मुनाफ़िक़ हे

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वहाबी देवबंदी का अक़ीदा हे नबी को कुछ ताक़त नहीं

हज़रात अहले हदीस कहलाने वाले वहाबी और देओबंदी तब्लीगी फ़िर्को का अक़ीदा हे की रसूलल्लाह सल्लल्लाहो तआला व सल्लम को कुछ ताकात नहीं और न इल्म इ गैब हे उनकी ताकात का तो यह हाल हे की वो अपनी जान तक को नफा नुकसान के मालिक नहीं तो दुसरो को क्या नफा पंहुचा सकते है :(ताकवियाहतुल ईमान स. 58 )

ईमान वालो का अक़ीदा की नबी सल्लल्लाहो तआला व सल्लम को हर ताकात हासिल है

हज़रात अल्लाह तआला ने अपने महबूब रसूल सल्लल्लाहो तआला व सल्लम को तमाम नेअमत व दौलत रहमत व बरकत और हर खैर ख़ज़ानों की कुंजी का मालिक व मुख़्तार और हर शर और बला के दूर करने की ताकात व कुव्वत अता फरमा कर आप सल्लल्लाहो तआला व सल्लम को दाफेईल बला और मुश्किल कुशा बनाया हे

1 अल्लाह तआला क़ुरआन मजीद में इरशाद फ़रमाता हे
और अल्लाह का काम नहीं की उन्हें अज़ाब करे जब तक ए महबूब तुम उन में तशरीफ़ फरमा हो(कन्जुल ईमान पारा 9 रुकुह 18 )

हज़रात गोया अल्लाह तआला ने इन आयत करीमा में साफ़ तोर पर जाहिर फरमा दिया की मेरा रसूल मोमिन तो मोमिन काफिरो के लिया भी दाफेईल बला है और काफिरो को भी आप की जाट से नफा पहुचता है !

2 अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता हे : और हम ने तुम्हे न भेजा मगर रहमत सारे जहान के लिए (कन्जुल ईमान पारा 17 रुकुह 7 )

गोया अल्लाह तआला ने बता दिया की ए सारी दुनिया वालो तुम को रहमत व बरकत मरे महबूब सल्लल्लाहो तआला व सल्लम के जरिये मिलेगी इसलिए की हम ने सब के लिया रहमत अपने महबूब नबी सल्लल्लाहो तआला व सल्लम को बनाया हे और जिस घर में रहमत होगी वह घर नेमत व दौलत सुकून व इत्मीनान का गहवारा होगा और जिस मकान में रहमत होगी उस मकान में बला व बीमारी मुसीबत व ज़हमत दूर हो जाएगी तो पता चला की अल्लाह तआला ने अपने हबीब हम बीमारो के तबीब रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो तआला व सल्लम को नफा पहुचाने और मुश्किलो को दूर करने वाला बनाया हे
इस पर आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फ़ज़िले बरेलवी रहमतुल्लाह तआला अलैह फरमाते हे

अपनी बनी हम आप बिगाड़े कौन बनाए बनाते यह है!
रफ़ेअ नाफ़ेह शाफ़ेह दफेअ क्या क्या रहमत लाते है !